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समाज एवं सम्प्रदाय में क्या अन्तर हैं। जानिए और समझिये

 


Rajesh Dhull



सभी सम्प्रदाय - व्यक्ती, परिवार ,वर्ग, समाज एवं स्थानीय संस्कृतियों के विरुद्ध - वैचारिक, बौधिक, दार्शनिक, महापुरूषों एवं आध्यात्मिक गुरुओ के नाम पर  राजनैतिक साजिशों के दल हैं।  यह सभी हमेशा समाज से अलग अस्तित्व बनाने के प्रयास में रहते हैं। 

यह वैसा हैं जैसे समाज रूपी सागर से कुछ जल लेकर तालाब बनाकर खुद को सागर से भी बड़ा बताना।  जबकि ऐसा कभी भी सम्भव नहीं हैं।  यह प्रयास कभी भी किसी भी सम्प्रदाय का पूर्ण नहीं हो सकता - जबकि समाज अपने आप मे पूर्ण हैं। क्योंकि समाज का निर्माण किसी व्यक्ती विशेष के द्वारा नहीं बल्कि , सभी परिवार, सभी वर्ग मिलकर समाज का सामुहिक अस्तित्व हैं। इसके विपरित सम्प्रदाय केवल कुछ लोगों के द्वारा निर्मित संगठन हैं मात्र हैं।  


समाज मे प्रत्येक व्यक्ती ,वर्ग स्वतन्त्र होता हैं 


सम्प्रदाय में लोगों को प्रत्येक सम्प्रदाय के अलग अलग निराधार असत्य अव्यवहारिक नियमो द्वारा गुलाम मानसिकता के दायरे मे रखने का प्रयास होता हैं जो कभी भी पूर्ण नहीं होता - यानी उस सम्प्रदाय में शामिल लोग उन नियमो का पालन नहीं कर पाते,  क्योंकि इंसान का स्वभाव ही स्वतंत्रता हैं,  वह कुछ समय बाद सम्प्रदाय से भागना चाहता हैं और आम हो जाता है । 


समाज एक दूसरे से संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता हैं।

जबकि सम्प्रदाय एक सामुदायिक व्यक्ती को विशेष बनाकर दूसरों को घृणित या मुर्ख बताता हैं।  


समाज के बिना व्यक्ती एवं परिवार का कोई अस्तित्व नहीं हैं। इंसान एक सामजिक प्राणी हैं।  

सम्प्रदाय मनुष्य के अस्तित्व को उसकी मानसिकता की गुलामी से खत्म करता हैं और उसे अव्यवहारिक कार्यकलापों से बाँधता हैं।  


समाज प्राकृतिक हैं इसलिए किसी भी बंधन मे नहीं बाँधता लेकिन सम्प्रदाय कुछ लोगों द्वारा बनाए गए एक कारागार हैं जो आपको गुलाम की तरह रखता हैं और अपनी मानसिकता पर कब्जा करता हैं। 


आप किसी भी सम्प्रदाय से आतें हो , आपका मूल अस्तित्व आपके, परिवार ,आपके वर्ग ,आपकी स्थानीय संस्कृति और समाज से हैं।  स्वंम को स्वतंत्र अनुभव करे । किसी भी सम्प्रदाय की विचारधारा आदि उत्तम हो सकती हैं लेकिन इसे केवल अध्यन का विषय समझकर जाने और स्वतंत्र बने ।। 


समस्त गुरुओ एवं महापुरूषों से इंसान को जागरूक बनने एवं स्वतन्त्र होने के संदेश दिए हैं और समाज को सर्वोपरि माना हैं । 


आप भी स्वतंत्र हैं आज़ाद हैं 

आप समाज के और खुद में समाज हैं। 


© Rajesh Dhull

Khaap Researcher

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