इतिहास के पन्नो के इस कार्यक्रम में हम आज आपको बतायेंगे दादर नगर हवेली की आज़ादी की कहानी, दादर नगर हवेली के 1 दिन के प्रधान मंत्री का रोचक किस्सा व् आरएसएस और जवाहर लाल नेहरु का दादर नगर हवेली को लेकर निर्णय के बारे में……………
बात शुरू करते हैं उससे जिसके बारे में आपने स्कूली किताबो में पड़ा की वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की हालाँकि इस विषय पर बात करने के लिए हम आपके समक्ष दूसरा कंटेंट फिर कभी रखेंगे
जब वास्कोडिगामा प्रथम बार भारत आया तो उसने कालीकट के राजा से समपर्क किया परन्तु कालीकट नरेश ने वास्को डिगामा को कोई भाव नहीं दिया . लेकिन वास्को डिगामा हिम्मत नहीं हारा और वो अन्य प्रयास करता रहा . और इसी दौरान पुर्तगालियों ने भारत की सरजमी पर पैर रख दिया और वे भारत आने बाले पहले यूरोपियण थे ये पहले कालीकट में कदम रखते हुए गोवा में पहुँच गये इसके बाद यह पुर्तगाली दमन दीव से से सीधा दादर नगर हवेली पहुँच गये और वहां पर पूर्व के मराठा साम्राज्य को हटाकर अपना कब्जा कर लिया, जिसके बाद दादर नगर हवेली के काल चक्र में सन आई 1947 और भारत की आज़ादी का काल आगया परन्तु दादर नगर हवेली आज भी अंग्रेजो के गुलामी में रह गया |
अब आगे जानिये कि………
कैसे दादर नगर हवेली को मिली अंग्रेजो से आज़ादी
कैसे 1 दशक का समय लग गया दादर नगर हवेली को भारत का अधिकारिक हिस्सा होने में………..
और यह भी आगे बतायेंगे कौन हुआ दादर नगर हवेली का एक दिवसीय प्रधानमंत्री…………..
'सबसे पहले आपको बताते हैं कि कैसे दादर नगर हवेली पर पुर्तगालियो का हो गया था कब्जा ?
दादर नगर हवेली पर कोली कहे जाने वाले सरदारों का राज सन 1200 में था लेकिन इसके लगभग 62 साल बाद राजस्थान के राजपूत राजा रामसिंह ने कोली सरदारों को हरा दिया और कब्ज़ा कर लिया दादर नगर हवेली पर जिसमे रामसिंह ने खुदत रामनगर के राजा के तौर पर स्त्थापित कर लिया |
आज कल यह रामनगर दादर नगर हवेली का धर्मपुर नाम से जाना जाता है राजा बनने के बाद रामसिंह ने रामनगर का विस्तार किया जिसमे उसने 8 गाँव और जोड़े जिसमे नगर हवेली भी एक था रामसिंह ने रामनगर (धर्मपुर) की राजधानी सिलाबासा बने और इतिहास की माने तो इस क्षेत्र में राजपूतों ने लगभग 400 साल अपना राज्य किया |
परन्तु सन 1700 के करीब रामनगर पर मराठा राज करने आगये परन्तु दूसरी तरफ राजा रामसिंह के वंशज सोम शाह ने दुबारा मराठाओ से युद्ध लड़ के उन्हें हरा दिया और फिर से कब्जा कर लिया , पर इस दौरान पुर्तगालियों ने भारत में लगातार अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया और इसी के चलते 1510 में पुर्तगालियों ने बीजापुर के राजा आदिल शाह को हराकर गोवा जीत लिया और इसके उपरान्त पुर्तगालियों ने बम्बई,बसई दमन और दीव की तरफ कूच कर दिया और एक के बाद एक कब्जा करते चले गये |1740 के आसपास मराठा और पुर्तगालियों का युद्ध फिर से हुआ और इस दौरान मराठाओ ने बम्बई और बसई को जीत लिया पर गोवा और दमनदीव अभी भी पुर्तगाली बचाने में कामयाब रहे |
1772 में मराठाओ की जल सेना के सिपाही जानोजी ने पुर्तगालियों के युद्धपोत को अपने कब्जे में लेकर उसे डुबो दिया , इससे पुर्तगाली तिलमिला गये और इस विषय को लेकर बो जा पहुंचे पेशवा के दरवार में और युद्धपोत की कीमत मांगने लगे , एक तरफ अंग्रेज मराठाओ को परेशान का बार बार युद्ध करने की चुनोतियाँ देने लगे इसको लेकर मराठा बहुत चिंतित थे और बो पुर्तगालियों से युद्ध नहीं चाहते थे इस कारण उन्होंने युद्धपोत का हरजाना देने के लिए पुर्तगालियों को नगर हवेली के 72 गाँव राजस्व वसूलने के लिए पुर्तगालियों को तब तक के लिए दिए जब तक युद्धपोत की कीमत वसूल नहीं हो जाये और वसूल होने पर उन्हें ये क्षेत्र वापस मराठाओ को देना होगा |
लेकिन सारा कुछ उलट पुलट होगया और पुर्तगालियों ने नगर हवेली वापस नही की बल्कि दादर इलाके को भी अपने कब्जे में लेने के प्रयास प्रारम्भ कर दिए , मराठा अपने आप में ही आपस में सत्ता पाने के लिए लड़ने लगे यानी की उनकी घरेलू लड़ाई छिड़ गयी और बो पुर्तगालियों से नगर हवेली बापस कराने में एकजुट ही नही हो पाए
और इसी मौके का फायदा उठाकर पुर्तगालियों ने अपने साम्राज्य का विस्तार प्रारम्भ कर दिया और मराठा साम्राज्य पतन की और बड चला व् पुर्तगाली दादर नगर हवेली पर पूरी तरह काबिज हो गये |
अब बात भारत की आज़ादी के बाद कि……………
जब भारत अंग्रेजो के चुंगुल से आज़ाद होगया तो दादर नगर हवेली पुर्तगालीयों के कब्जे में होने के कारण बो आज़ाद नहीं हो सका और भारत पुर्तगालियों से प्यार से दादर नगर हवेली को आजाद करने की मांग करने लगा परन्तु पुर्तगाली इसको तैयार नहीं हुए परन्तु दादर नगर हवेली की जनता पूरी तरह भारत के पक्ष में थी, जिस कारण बहां पर आज़ादी की लड़ाई जनता ने छेड़ दी , जिसमे सबसे पहला नाम आया पुर्तगाली बैंक में कार्यरत एक कर्मचारी अप्पासाहेब का जिह्नोने दादर के स्थानियों नेताओ से सम्पर्क करना प्रारम्भ कर दिया और दादर में संघर्ष की गति तेज होने लगी |
दादर नगर हवेली के क्रांतिकारियों ने कई संगठन बना लिए जो आज़ादी की लड़ाई को संयुक्त रूप देने लगे और इन सन्गठन ने अपनी एक मुलाकात लवासा में 1854 में की जहाँ सर्वसम्मिति से तय हुआ की कोई क्रन्तिकारी कदम उठाया जाए और इसमें सन्गठन के नेता मासेरिनहास और वामन देसाई के नेतृत्व में कुछ क्रांतिकारियों द्वरा पुलिस स्टेशन पर हमला कर वहां तैनात सिपाहियों को कब्जे में ले लिया और पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फेहरा दिया |
इसी के क्रम दुसरा हमला जुलाई 1854 में फिर से पुलिस स्टेशन पर किया गया और लगातार इन हमलो की संख्या बढती गयी व् कई पुलिस स्टेशन अपने कब्जे मे कर लिए परन्तु पुर्तगालियों का सबसे बड़ा गढ़ सिलवासा अभी भी पुर्तगालियों के कब्जे में था उसे आज़ाद कराने के लिए विशेष योजना बनाई गयी
जिसमे क्रांतिकारियों ने वहां के पुलिस स्टेशन पर कब्जा करने के लिए तीन गुट बनाये और सिलवासा पुलिस स्टेशन पर लगातार निगरानी रखी जाने लगी और मौक़ा पाते ही एक साथ हमला किया गया तो पुलिस कर्मियों को कब्जे में ले लिया गया और इस तरह नगर हवेली को पूरी तरह आज़ाद घोषित कर दिया गया |
अब जानिये कहानी भारत की आज़ादी को लेकर लगतार विवादों के विषय में रहने बाले आरएसएस की भूमिका
लगातार आप यह सुनते आरहे होंगे की भारत की आज़ादी में आरएसएस का क्या योगदान रहा अब भारत की अआज़दी ने क्या योगदान था इस विषय पर तो अलग से विस्तृत चर्चा हो सकती है और लम्बी बहस का विषय भी कोई बना सकता है परन्तु दादर नगर हवेली के विषय में एक बड़े लेखक रतन शारदा के पुस्तक “संघ और स्वराज” को उठाकर देखें तो उसमे लिखा है
जब दादर नगर हवेली में सन 54 के लगभग जब आज़ादी की मांग अपने पूर्ण चरम पर थी तो उसी दौरान संघ के स्वयं सेवक राजा वाकणकर , नाना कजरेकर दाद्र्द्र नगर हवेली और दमन में लगातार स्त्जिती को भांपने के लिए समय समय पर भ्रमण करते रहे और उन स्थानीय लोगो से समपर्क बनाया जो भारत के साथ आना चाहते थे तो उसी दौरान संघ ने आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे दो संगठन NMLO व् AGD के साथ आज़ादी के लिए साझेदारी कर ली | और इसके बाद 1 अगस्त को संघ के पुणे के स्वयं सेवक विनायक राव आप्टे के नेतृत्व में सैंकड़ों स्वयंसेवकों ने दादर नगर हवेली पर हमला बोल दिया और उन्होंने लगभग 200 पुर्तगालियों को बंधक बनाकर आत्मसमर्पण करा लिया |
जब दादर नगर हवेली को मिला एक दिन का प्रधानमंत्री
और इसी के साथ एक बड़ी लबी जंग के पश्चात दादर नगर हवेली 2 अगस्त 1954 को आज़ाद होगया परन्तु इसके बाद लगभग 5 साल तक जनता ने यहाँ अपना शासन चलाया और यहाँ लोकल लोगो की सिटीजन काउन्सिल ने राज्य किया उसकी सबसे बड़ी यह बजह थी की पुर्तगाली इस क्षेत्र पर अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं थे और वो अंतराष्ट्रीय मंचो पर लगातार आवाज उठाकर कहते रहे की नगर अह्वेली पुर्तगालियों का है | वे इस मुदद एको लेकर अंतराष्ट्रीय न्यायालय भी पहुंचे और वहां से फैसला पुर्तगालियों के पक्ष में सुनाया गया | जिसको लेकर दादर नगर हवेली के नेताओ और जनता को चिंता सताने लगी और उन्होंने शीघ्र भारत से खुद को विलय करने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही |
तब भारत के प्रधानमंत्री ने गुजरत कैडर के आईएस केजी बदलानी को दादर नगर हवेली जिम्मेदारियां सौप कर भेजा और वहां बातचीत करके एक अजब गजब तरकीब सुझाई गयी |
वहां की लोकल काउन्सिल ने केजी बदलानी को अपना एक दिन का प्रधानमन्त्री चुना और इसी क्रम में दादर नगर हवेली के प्रधानमन्त्री बन चुके केजी बदलानी ने भारत के प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के साथ 11 अगस्त 1961 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किये और यह इस ससमझौते में बही लिखा था जिसका इंतज़ार दादर की जनता सैंकड़ों वस्र्हो से कर रही थी उसकी लाइनो में लिखा था आज से दादर नगर हवेली भारत का हिस्सा होगा , और इसी के साथ पुर्तगाली खाली हाथ मलते रहे गये दूसरी तरफ भारत की संसद ने दादर नगर हवेली एक्ट 1961 पास कर इसे भारत का केंद्रशासित राज्य घोषित कर दिया , इस फैसले के बाद जवाहर लाल नेहरु से लेकर हर भारतीय और प्रत्येक नगर हवेली के व्यक्ति ने खुशियाँ मनाई परन्तु अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत के इस फैसले से नाराज रहने लगा और उन्होंने भारत के इस फैसले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं दी परन्तु समय बीतता गया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नये परिवर्तन आते गये और 1974 में बह समय भी आगया जब अंतरराष्ट्रीय स्तर से इस फैसले को भी मान्यता दे दी गयी |
all Copy Right Chaupal View
Comments
Post a Comment